विस्तृत उत्तर
यजुर्वेद यज्ञ और कर्मकांड का वेद है। 'यजुष्' का अर्थ है यज्ञ में अर्पित किया जाने वाला मंत्र। इसमें 1975 मंत्र और 40 अध्याय हैं। यजुर्वेद की दो प्रमुख शाखाएँ हैं — कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। इन दोनों में मूलभूत अंतर इस प्रकार है:
कृष्ण यजुर्वेद में मंत्रों के साथ उनकी व्याख्या और अर्थ-विवेचन भी एक साथ मिले हुए हैं। इसीलिए इसे 'मिश्र' या 'अव्यवस्थित' भी कहते हैं। इसकी तैत्तिरीय संहिता सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके अलावा काठक संहिता, मैत्रायणी संहिता और कपिष्ठल-कठ संहिता भी इसकी प्रमुख शाखाएँ हैं। दक्षिण भारत में कृष्ण यजुर्वेद की परंपरा अधिक प्रचलित है। कृष्ण यजुर्वेद के प्रमुख उपनिषद कठोपनिषद और तैत्तिरीयोपनिषद हैं।
शुक्ल यजुर्वेद में मंत्र और उनकी व्याख्या अलग-अलग हैं — संहिता और ब्राह्मण भाग स्पष्ट रूप से पृथक हैं। इसे 'शुद्ध' यजुर्वेद भी कहते हैं। इसकी माध्यंदिन और काण्व दो शाखाएँ मुख्य रूप से प्रचलित हैं। शतपथ ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ब्राह्मण ग्रंथ है। इसके प्रमुख उपनिषद ईशावास्योपनिषद और बृहदारण्यकोपनिषद हैं।
दोनों का कर्मकांडीय उद्देश्य एक है — यज्ञ में अध्वर्यु ऋत्विज की भूमिका के लिए आवश्यक मंत्र — परंतु उनकी शैली और व्यवस्था में यह मूलभूत भेद है।





