विस्तृत उत्तर
तैत्तिरीय उपनिषद (1.11.2): *'मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।'*
अर्थ: अतिथि = देवता समान मानो। 'अतिथि' = 'अ-तिथि' = बिना तिथि (without date) = बिना बताए आने वाला। जो बिना सूचना आए = सच्चा अतिथि।
गहरा अर्थ: प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर। अतिथि = ईश्वर का रूप। सेवा = ईश्वर सेवा। 'नर सेवा = नारायण सेवा।'
4 'देवो भव': माता=देवता, पिता=देवता, गुरु=देवता, अतिथि=देवता = चार स्तंभ जिन पर भारतीय संस्कृति खड़ी।
आधुनिक: भारत = Incredible India campaign = 'Atithi Devo Bhava' = राष्ट्रीय पर्यटन नारा भी बना।




