विस्तृत उत्तर
त्रिपुंड (ललाट पर भस्म की तीन आड़ी रेखाएं) शिव भक्ति का सबसे प्रमुख बाह्य चिह्न है। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है:
तीन रेखाओं का प्रतीकात्मक अर्थ
1त्रिगुण — सत्त्व, रज, तम
तीन रेखाएं प्रकृति के तीन गुणों का प्रतीक हैं। त्रिपुंड लगाना = इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर शिव (त्रिगुणातीत) तक पहुंचने की साधना।
2त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु, महेश
तीन रेखाएं सृष्टि, स्थिति और संहार — तीनों शक्तियों का प्रतीक।
3तीन लोक — भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक
त्रिपुंड तीनों लोकों पर शिव की सर्वव्यापकता का प्रतीक।
4तीन अग्नि — गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि
वैदिक संदर्भ में त्रिपुंड तीन पवित्र अग्नियों का प्रतीक है।
5ॐ के तीन अक्षर — अ, उ, म
त्रिपुंड 'ओंकार' का दृश्य प्रतीक है।
6तीन शक्तियां — इच्छा, ज्ञान, क्रिया
शिव की तीन मूल शक्तियों का बोध।
7जन्म-मृत्यु-पुनर्जन्म का चक्र
भस्म = दाह संस्कार का अवशेष। त्रिपुंड लगाना = संसार चक्र की अनित्यता का स्मरण।
जाबालोपनिषद् का वचन
इस उपनिषद् में त्रिपुंड धारण का विस्तृत विधान दिया गया है। इसमें कहा गया है कि त्रिपुंड धारण करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है और शिव सायुज्य (शिव से एकत्व) प्राप्त करता है।
भस्म लगाने का गहन अर्थ
भस्म अंतिम सत्य है — सब कुछ जलकर भस्म हो जाता है। भस्म लगाना = मृत्यु का स्मरण, अहंकार का त्याग, वैराग्य का बोध।





