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विस्तृत उत्तर
क्षीरसागर का सामान्य अर्थ दूध का समुद्र माना जाता है, लेकिन इस कथा में इसका अर्थ बहुत गहरा है। यहाँ क्षीरसागर उस दिव्य कारण-जल का प्रतीक है जिसमें सृष्टि के सभी रूप, जीव और कर्म बीज रूप में सुरक्षित रहते हैं। जब महाप्रलय के बाद सब कुछ लीन हो जाता है, तब यही एकसूत्रीय अवस्था शेष रहती है। इसी शांत और अव्यक्त आधार से फिर आदिनाद, श्वास और कालचक्र के माध्यम से सृष्टि प्रकट होती है।
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