विस्तृत उत्तर
धन या अर्थ के सही उद्देश्य को धर्म से जोड़ा गया है। पाठ कहता है कि धर्म का फल मोक्ष है, अर्थ-प्राप्ति नहीं; और अर्थ केवल धर्म के लिये है। भोग-विलास धन का फल नहीं माना गया। आगे कहा गया कि भोग का उद्देश्य इंद्रियों की तृप्ति नहीं, बल्कि जितने से जीवन चल सके उतना जीवन-निर्वाह है। जीवन का फल भी तत्त्व-जिज्ञासा है, न कि बहुत कर्म करके केवल स्वर्ग आदि प्राप्त करना। इसलिए पैसा केवल भोग, प्रदर्शन या इंद्रिय-सुख के लिये कमाने की वस्तु नहीं है। उसका सही उपयोग धर्म, जीवन-निर्वाह और उस जीवन को परम तत्त्व की खोज की ओर ले जाने में है।
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