विस्तृत उत्तर
केनोपनिषद सामवेद की तलवकार शाखा से संबंधित है। 'केन' शब्द इसके प्रथम प्रश्न से आया है — 'केनेषितं पतति प्रेषितं मनः' — अर्थात् किसकी प्रेरणा से मन गतिशील होता है?
इस उपनिषद का मुख्य संदेश यह है कि ब्रह्म वह परम सत्ता है जिसे किसी भी इंद्रिय, मन या बुद्धि के द्वारा सीधे नहीं जाना जा सकता — क्योंकि वही उन सबकी शक्ति का मूल स्रोत है। जो नेत्रों को देखने की शक्ति देता है वह ब्रह्म है, जो कानों को सुनने की शक्ति देता है वह ब्रह्म है, जो मन को सोचने की शक्ति देता है वह ब्रह्म है। इसीलिए वह स्वयं न देखा जा सकता है, न सुना जा सकता है।
इसमें एक अत्यंत गहरी बात कही गई है — जो कहता है 'मैं ब्रह्म को जानता हूँ', वह नहीं जानता; और जो कहता है 'मैं नहीं जानता', वह जानता है। ब्रह्म-ज्ञान की यह विलक्षणता है कि वह साधारण ज्ञान के दायरे से परे है।
केनोपनिषद के तृतीय और चतुर्थ खंड में एक सुंदर आख्यान है — देवताओं को एक बार ब्रह्म ने असुरों पर विजय दिलाई, परंतु देवताओं को अभिमान हो गया कि यह विजय उनकी अपनी शक्ति से मिली है। तब ब्रह्म ने यक्ष के रूप में प्रकट होकर उनका अहंकार दूर किया — अग्नि एक तिनका नहीं जला सका, वायु एक तिनका नहीं उड़ा सका। देवी उमा ने इंद्र को बताया कि वह यक्ष ब्रह्म ही था। इससे यह सिखाया गया कि समस्त शक्ति ब्रह्म की है, जीव में अहंकार नहीं होना चाहिए।





