विस्तृत उत्तर
सामवेद चारों वेदों में अपनी संगीतात्मकता के कारण सर्वाधिक विशिष्ट है। 'साम' का अर्थ है — लय, गान और उपासना। यह मुख्यतः गाया जाने वाला वेद है, इसी कारण इसे 'गान-वेद' भी कहते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है — 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' — अर्थात् वेदों में मैं सामवेद हूँ। यह घोषणा सामवेद की सर्वोच्च प्रतिष्ठा को दर्शाती है।
सामवेद में 1875 मंत्र हैं, जिनमें से अधिकांश ऋग्वेद से लिए गए हैं — केवल 75-99 के आसपास मंत्र मौलिक हैं। परंतु इन मंत्रों को विशेष सुर-ताल-लय के साथ गाया जाता है जो इन्हें अत्यंत विशिष्ट बनाता है। इसीलिए कहा जाता है कि समस्त भारतीय शास्त्रीय संगीत, स्वर, राग, ताल और नृत्य का उद्गम सामवेद से ही हुआ है।
सामवेद का गायन यज्ञ में 'उदगाता' ऋत्विज करते थे। यज्ञ के चार प्रमुख पुरोहितों में उदगाता का कार्य सामगान था। इस वेद का प्रमुख उपनिषद 'छान्दोग्य उपनिषद' है जो सभी उपनिषदों में सबसे विशाल है।
इसे मुख्यतः वे लोग पढ़ते हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत, उपासना और यज्ञ-विद्या में रुचि रखते हैं। परंपरागत रूप से इसका अध्ययन वे ब्राह्मण करते थे जो यज्ञ में उदगाता की भूमिका निभाते थे।





