विस्तृत उत्तर
हिंदू धर्म में समानता का सिद्धांत गहरे आध्यात्मिक आधार पर टिका हुआ है। यह केवल सामाजिक समता की बात नहीं करता, बल्कि आत्मिक एकता के सत्य को उद्घाटित करता है।
वैदिक दृष्टि — ऋग्वेद में कहा गया है — 'एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति' — अर्थात सत्य एक ही है, विद्वान जन उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं। इसमें सभी धर्मों और जीवों के प्रति समभाव का बीज है।
आत्मा की दृष्टि से समानता — उपनिषदों का केंद्रीय संदेश है — 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) और 'तत्त्वमसि' (वह भी तुम ही हो)। इसका अर्थ है कि प्रत्येक जीव में एक ही परमात्मा का अंश विद्यमान है — अतः सभी मूलतः समान हैं।
भगवद गीता में — श्रीकृष्ण ने कहा — 'विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।' (5.18) — अर्थात जो ज्ञानी हैं, वे एक विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल — सबको समान दृष्टि से देखते हैं।
शबरी और एकलव्य जैसे उदाहरण — भगवान राम ने वनवासी भीलनी शबरी के जूठे बेर प्रेम से खाए — जो जाति-भेद को नकारता है। इसी तरह भक्ति परंपरा में कबीर, रैदास, नरसिंह मेहता जैसे निम्न जाति के संत परम आदरणीय रहे।
वर्ण-व्यवस्था बनाम जन्म — गीता (4.13) में कहा गया — 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः' — अर्थात चार वर्ण गुण और कर्म के आधार पर हैं, जन्म के आधार पर नहीं। शास्त्रीय दृष्टि से व्यक्ति की योग्यता उसके कर्म और स्वभाव से तय होती है।
आधुनिक संत-परंपरा — स्वामी विवेकानंद ने कहा — 'मैं ऐसे किसी भी धर्म को नहीं मानता जो किसी अन्य के दुःख पर आधारित हो।' रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों की साधना की और अनुभव किया कि सब एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।
सारांश में, हिंदू दर्शन सभी जीवों में एक ही आत्मा का दर्शन करता है। सामाजिक भेद व्यावहारिक हो सकते हैं, किंतु आत्मिक स्तर पर सब बराबर हैं — यही हिंदू धर्म का गहरा समानता-सिद्धांत है।





