विस्तृत उत्तर
अथर्ववेद चारों वेदों में चतुर्थ है और अपने विषय-वैविध्य के कारण अत्यंत विशिष्ट है। 'अथर्व' शब्द का अर्थ है — अकंपित, स्थिर बुद्धि से किया गया कर्म। यह वेद आत्मज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन के अनेक पहलुओं को समेटता है।
अथर्ववेद में 20 कांड, 731 सूक्त और लगभग 5977 मंत्र हैं। यह ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद से भिन्न इस अर्थ में है कि इसमें ज्ञान, दर्शन, प्रार्थना के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन से जुड़े अनेक विषय शामिल हैं।
इसके मुख्य विषय हैं — आरोग्य विज्ञान, ओषधि और चिकित्सा (जिससे आयुर्वेद का विकास माना जाता है), अभिचार, राज्यशास्त्र, गृहस्थ जीवन, कृषि, शांति-पाठ, रक्षा-मंत्र, शत्रु-निवारण और ब्रह्मज्ञान। यज्ञ में ब्रह्मा की भूमिका अथर्वा ऋत्विज निभाता था — वह यज्ञ का संचालक और दोषनिवारक होता था।
इस वेद को कभी 'अथर्वाङ्गिरस वेद' भी कहते हैं क्योंकि इसमें अथर्वा ऋषि के शांतिकारक मंत्र और अंगिरा ऋषि के अभिचार-मंत्र दोनों संग्रहीत हैं। इसके प्रमुख उपनिषद मुण्डकोपनिषद, माण्डूक्योपनिषद और प्रश्नोपनिषद हैं।
पारंपरिक रूप से अथर्ववेद को पहले कुछ लोगों ने मुख्य वेद त्रयी से अलग रखा था, परंतु बाद में इसे पूर्ण वैदिक मान्यता मिली।





