विस्तृत उत्तर
पर्जन्यास्त्र की प्राचीनता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण हमें अथर्ववेद में मिलता है। अथर्ववेद के एक मंत्र में आग्नेयास्त्र और वायव्यास्त्र के साथ-साथ पर्जन्यास्त्र का भी स्पष्ट उल्लेख है, जहाँ शत्रु सेना को मोहित करने, उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ बनाने और उनका विनाश करने के लिए इन शक्तिशाली अस्त्रों का आह्वान किया गया है। यह संदर्भ न केवल वेदों में इस अस्त्र की उपस्थिति को प्रमाणित करता है बल्कि इसके प्राचीन सामरिक महत्व को भी रेखांकित करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक शक्तियों को अस्त्र के रूप में प्रयोग करने की अवधारणा वैदिक काल जितनी ही पुरानी है।
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