विस्तृत उत्तर
अद्वैत का शाब्दिक अर्थ है — 'जहाँ दो नहीं', अर्थात् जहाँ केवल एक ही परम सत्ता है। अद्वैत वेदांत आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित भारतीय दर्शन का सर्वाधिक प्रभावशाली और गहरा दार्शनिक मत है।
इसका मूलसूत्र है — 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः' — अर्थात् ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, यह दिखने वाला जगत मिथ्या (स्वप्नवत) है, और जीव कोई और नहीं बल्कि ब्रह्म ही है।
सरल भाषा में समझें — जैसे स्वप्न में हम अलग-अलग व्यक्ति, घटनाएँ और वस्तुएँ देखते हैं, परंतु जागने पर पता चलता है कि वह सब हमारे ही मन की कल्पना थी — उसी प्रकार यह संसार, इसमें दिखने वाली बहुलता, जीव और ईश्वर का भेद — ये सब अज्ञान (माया) के कारण प्रतीत होते हैं। जब आत्म-ज्ञान उत्पन्न होता है तो यह भेद मिट जाता है और जीव को अनुभव होता है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' — मैं ही ब्रह्म हूँ।
अद्वैत में माया एक बहुत महत्वपूर्ण अवधारणा है। माया के कारण ब्रह्म से जगत प्रतीत होता है और जीव अपने को ब्रह्म से अलग समझने लगता है। यह माया न सत् है न असत् — यह अनिर्वचनीय है।
मोक्ष का अर्थ है इस भ्रम से मुक्ति — जब साधक जान लेता है कि वह ब्रह्म से अभिन्न है, तब आवागमन का चक्र समाप्त हो जाता है।





