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शिव पूजा📜 शिव पुराण, मांडूक्योपनिषद, नाद बिंदु उपनिषद, पतञ्जलि योगसूत्र (1.27-28)2 मिनट पठन

शिव पूजा में मंत्र जप क्यों किया जाता है?

संक्षिप्त उत्तर

मंत्र जप क्यों: पतञ्जलि (1.27-28): मंत्र = ईश्वर का वाचक, जप = साक्षात्कार। नाद बिंदु उपनिषद: नाद-ब्रह्म = परब्रह्म-प्राप्ति। मन-एकाग्रता का सरलतम उपाय। संस्कार-निर्माण (मृत्यु-काल भी)। मांडूक्य: ॐ-ध्वनि = वातावरण-शुद्धि। नित्य 108 जप।

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विस्तृत उत्तर

शिव पूजा में मंत्र-जप के कारण वेद-उपनिषद और शिव पुराण में विस्तार से वर्णित हैं।

मंत्र-जप के पाँच मूल कारण

1मंत्र = शिव का वाचक

पतञ्जलि योगसूत्र (1.27-28): 'तस्य वाचकः प्रणवः। तज्जपस्तदर्थभावनम्।' — ईश्वर का वाचक 'ॐ' है। उसका जप और अर्थ-भावना = ईश्वर-साक्षात्कार। 'ॐ नमः शिवाय' = शिव-तत्त्व का साक्षात् शब्द-स्वरूप।

2नाद-ब्रह्म

नाद बिंदु उपनिषद: 'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति।' — नाद (ध्वनि) ब्रह्म में निपुण व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्त होता है। मंत्र = नाद-ब्रह्म का प्रकट रूप।

3मन-एकाग्रता

बिना मंत्र के पूजा में मन भटकता है। मंत्र की ध्वनि-तरंग मन को एक केंद्र पर रोकती है — यह ध्यान का सबसे सहज उपाय है।

4संस्कार-निर्माण

शिव पुराण: नित्य मंत्र-जप से चित्त में शिव-भाव के गहरे संस्कार बनते हैं। मृत्यु के समय भी मंत्र स्वतः स्मरण होता है — यही मोक्ष का मार्ग।

5वातावरण-शुद्धि

मांडूक्योपनिषद: 'ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्।' — ॐ की ध्वनि-तरंगें (vibrations) संपूर्ण वातावरण को शुद्ध करती हैं। शोध-अध्ययन भी इसकी पुष्टि करते हैं।

शिव पुराण में जप-संख्या

  • नित्य: 108 बार (1 माला)
  • विशेष अनुष्ठान: 1008 बार
  • महाशिवरात्रि: यथाशक्ति, अनवरत
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शास्त्रीय स्रोत
शिव पुराण, मांडूक्योपनिषद, नाद बिंदु उपनिषद, पतञ्जलि योगसूत्र (1.27-28)
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