विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में मोक्ष का मार्ग
उपनिषदों में मोक्ष की परिभाषा: आत्मा-ब्रह्म की एकता का साक्षात्कार = मोक्ष (अद्वैत वेदांत)। जन्म-मरण चक्र से सम्पूर्ण मुक्ति।
मोक्ष के मार्ग — उपनिषद वचन
(1) ज्ञानमार्ग (मुण्डकोपनिषद 2/2/8-9): 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे।।' — जब ब्रह्म का दर्शन होता है, तब हृदय-ग्रंथि टूट जाती है, सभी संशय दूर होते हैं और समस्त कर्म क्षय हो जाते हैं — यही मोक्ष है।
(2) श्रवण-मनन-निदिध्यासन (बृहदारण्यक 4/4/22): 'आत्मा वा अरे श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।' — आत्मा को सुनो, मनन करो और निदिध्यासन (ध्यान) करो। यही मोक्ष का त्रिस्तरीय मार्ग है।
(3) उत्तिष्ठत — जागरण (कठोपनिषद 3/14): 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।' — उठो, जागो, श्रेष्ठ पुरुषों से ज्ञान प्राप्त करो। यह मार्ग क्षुर की धार जैसा दुर्गम है।
(4) ओम् का ध्यान (माण्डूक्योपनिषद): ओम् के चार मात्राओं का ध्यान — अकार, उकार, मकार और तुरीय — से ब्रह्म में प्रवेश होता है।
(5) कर्म + ज्ञान का समन्वय (ईशावास्योपनिषद 11-14): न केवल कर्म, न केवल ज्ञान — दोनों का संतुलन अमृतत्व देता है।
उपनिषदों का अंतिम संदेश: 'तत्त्वमसि' — वह तू ही है। जिसे खोज रहे हो वह भीतर ही है — यह अनुभव ही मोक्ष है।





