विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में ज्ञान का महत्व
उपनिषदों में ज्ञान — परम पुरुषार्थ
उपनिषदों का एकमात्र लक्ष्य ब्रह्मज्ञान है। वेदांत दर्शन में ज्ञान ही एकमात्र मोक्षदायी साधन है।
मुण्डकोपनिषद — दो प्रकार का ज्ञान (1/1/3)
*'द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च।'*
— ब्रह्मवेत्ता दो विद्याएं बताते हैं — परा (ब्रह्मज्ञान) और अपरा (शास्त्र-ज्ञान)।
परा विद्या का फल (2/2/8)
*'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।'*
— परा विद्या से हृदय-ग्रंथि टूटती है, सभी संशय दूर होते हैं और सभी कर्म क्षय हो जाते हैं।
कठोपनिषद (1/2/23) — ज्ञान की दुर्लभता
*'आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः।'*
— आत्मा को बताने वाला भी आश्चर्य है, पाने वाला भी आश्चर्य है और जानने वाला भी आश्चर्य — क्योंकि आत्मज्ञान अत्यंत दुर्लभ है।
ज्ञान के प्रकार — उपनिषद अनुसार
- ▸शाब्दिक ज्ञान — श्रवण से प्राप्त
- ▸बौद्धिक ज्ञान — मनन से प्राप्त
- ▸अनुभव-ज्ञान (अपरोक्षानुभूति) — निदिध्यासन से प्राप्त — यही परम ज्ञान है
तैत्तिरीय उपनिषद (2/4)
*'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।'*
— जहाँ से वाणी मन सहित लौट आती है — वही आनंद-ब्रह्म है। ज्ञान की अंतिम सीमा वहाँ है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं।
ज्ञान का फल
बृहदारण्यक (4/4/22) — *'आत्मानं वेद अहं ब्रह्मास्मि'* — जो आत्मा को जानता है कि 'मैं ब्रह्म हूँ' — वह समस्त जगत बन जाता है। यही ज्ञान का चरम फल है।





