विस्तृत उत्तर
उपनिषदों के अनुसार, 'साक्षी' वह शुद्ध, नित्य और निर्लिप्त चेतना (आत्मा) है, जो मन की सभी अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और शरीर के सभी कर्मों को देखती है, पर स्वयं उसमें लिप्त नहीं होती।
यही हमारा वास्तविक, अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
साक्षी वह शुद्ध, नित्य और निर्लिप्त चेतना (आत्मा) है जो मन की सभी अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और कर्मों को देखती है पर स्वयं लिप्त नहीं होती — यही हमारा वास्तविक स्वरूप है।
उपनिषदों के अनुसार, 'साक्षी' वह शुद्ध, नित्य और निर्लिप्त चेतना (आत्मा) है, जो मन की सभी अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और शरीर के सभी कर्मों को देखती है, पर स्वयं उसमें लिप्त नहीं होती।
यही हमारा वास्तविक, अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
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