ध्यान साधनाध्यान में साक्षी भाव क्या होता है?देखना — भाग नहीं लेना। विचार/भावना/शरीर=देखो→जाने दो। मुंडक: '2 पक्षी — 1 खाता, 1 देखता=आत्मा।' गीता: 'उपद्रष्टा।' ध्यान+दैनिक=सबसे शक्तिशाली।#साक्षी#भाव#क्या
लोकहंस गीता में आत्मा का स्वरूपहंस गीता में आत्मा को मन, शरीर और अवस्थाओं से अलग साक्षी चेतना कहा गया है।#आत्मा#हंस गीता#साक्षी
साक्षी का तत्व दर्शनसाक्षी क्या होता है?साक्षी वह शुद्ध, नित्य और निर्लिप्त चेतना (आत्मा) है जो मन की सभी अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और कर्मों को देखती है पर स्वयं लिप्त नहीं होती — यही हमारा वास्तविक स्वरूप है।#साक्षी#निर्लिप्त चेतना#आत्मा
पूजा विधानमंत्र जपते समय दीपक क्यों जलाते हैं और इसका आध्यात्मिक महत्व क्या हैदीपक को साधना का साक्षी और अग्नि देव का प्रतीक माना जाता है, जो अज्ञान को दूर कर जप को सिद्ध बनाता है।#दीपक#जप#अग्नि
संस्कार विधिवैदिक विवाह में अग्नि साक्षी क्यों होती है?अग्नि साक्षी: सर्वोच्च (देवमुख — सब देवता पहुँचती), शाश्वत (अमर साक्षी = शाश्वत वचन), शुद्धिकारक (विवाह पवित्र), गार्हपत्य अग्नि (जीवनभर), सप्तपदी अग्नि प्रदक्षिणा। कानूनी: हिन्दू विवाह अधिनियम 1955।#अग्नि#विवाह#साक्षी
शास्त्र ज्ञानउपनिषद में ध्यान का मार्ग क्या है?उपनिषदों में ध्यान के तीन मुख्य मार्ग हैं — ओम्-उपासना (माण्डूक्य), 'नेति नेति' — निराकरण मार्ग (बृहदारण्यक 4/3/32) और 'सोऽहम्' — प्राण-ध्यान। तुरीय अवस्था — शुद्ध साक्षी-चेतना — ध्यान की परिणति है जहाँ 'अयमात्मा ब्रह्म' का साक्षात्कार होता है।#ध्यान मार्ग#उपनिषद#ओम्