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शास्त्र ज्ञान📜 कठोपनिषद 2/18-20, बृहदारण्यक 4/4/5, तैत्तिरीय उपनिषद 2/1-5 (पंचकोश), माण्डूक्योपनिषद2 मिनट पठन

उपनिषद में आत्मा का वर्णन कैसे है?

संक्षिप्त उत्तर

कठोपनिषद (2/18) में यमराज ने नचिकेता को बताया — आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत है; शरीर के नाश से यह नष्ट नहीं होती। तैत्तिरीय उपनिषद के पंचकोश सिद्धांत में आत्मा पाँचों कोशों से परे है। माण्डूक्य में 'तुरीय' अवस्था आत्मा का शुद्ध स्वरूप है।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में आत्मा का वर्णन

कठोपनिषद — यमराज-नचिकेता संवाद

न जायते म्रियते वा विपश्चित् नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।' (2/18)

— यह आत्मा न जन्मती है, न मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश से यह नष्ट नहीं होती। (यही श्लोक गीता 2/20 में भी है।)

पंचकोश सिद्धांत (तैत्तिरीय उपनिषद 2/1-5)

आत्मा पाँच कोशों से ढकी है:

  1. 1अन्नमय कोश — स्थूल शरीर
  2. 2प्राणमय कोश — प्राण-शक्ति
  3. 3मनोमय कोश — मन और इंद्रियाँ
  4. 4विज्ञानमय कोश — बुद्धि
  5. 5आनंदमय कोश — सुषुप्ति में आनंद

इन सभी से परे — शुद्ध आत्मा (ब्रह्म) है।

बृहदारण्यक उपनिषद (4/4/5) — आत्मा और कर्म: 'तद्यथाकारी तद्यथाचारी तद्भवति।' — जैसा कर्म, जैसा आचरण — वैसा ही बनता है।

माण्डूक्योपनिषद — चार अवस्थाएं: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — इन तीनों का साक्षी 'तुरीय' ही आत्मा का शुद्ध स्वरूप है।

अद्वैत का निष्कर्ष: आत्मा और ब्रह्म एक हैं — 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव ही मोक्ष है।

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शास्त्रीय स्रोत
कठोपनिषद 2/18-20, बृहदारण्यक 4/4/5, तैत्तिरीय उपनिषद 2/1-5 (पंचकोश), माण्डूक्योपनिषद
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