विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में आत्मा का वर्णन
कठोपनिषद — यमराज-नचिकेता संवाद
न जायते म्रियते वा विपश्चित् नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।' (2/18)
— यह आत्मा न जन्मती है, न मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश से यह नष्ट नहीं होती। (यही श्लोक गीता 2/20 में भी है।)
पंचकोश सिद्धांत (तैत्तिरीय उपनिषद 2/1-5)
आत्मा पाँच कोशों से ढकी है:
- 1अन्नमय कोश — स्थूल शरीर
- 2प्राणमय कोश — प्राण-शक्ति
- 3मनोमय कोश — मन और इंद्रियाँ
- 4विज्ञानमय कोश — बुद्धि
- 5आनंदमय कोश — सुषुप्ति में आनंद
इन सभी से परे — शुद्ध आत्मा (ब्रह्म) है।
बृहदारण्यक उपनिषद (4/4/5) — आत्मा और कर्म: 'तद्यथाकारी तद्यथाचारी तद्भवति।' — जैसा कर्म, जैसा आचरण — वैसा ही बनता है।
माण्डूक्योपनिषद — चार अवस्थाएं: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — इन तीनों का साक्षी 'तुरीय' ही आत्मा का शुद्ध स्वरूप है।
अद्वैत का निष्कर्ष: आत्मा और ब्रह्म एक हैं — 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव ही मोक्ष है।





