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उपनिषद में आत्मा का वर्णन कैसे है?

कठोपनिषद (2/18) में यमराज ने नचिकेता को बताया — आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत है; शरीर के नाश से यह नष्ट नहीं होती।

संक्षिप्त उत्तर

कठोपनिषद (2/18) में यमराज ने नचिकेता को बताया — आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत है; शरीर के नाश से यह नष्ट नहीं होती। तैत्तिरीय उपनिषद के पंचकोश सिद्धांत में आत्मा पाँचों कोशों से परे है। माण्डूक्य में 'तुरीय' अवस्था आत्मा का शुद्ध स्वरूप है।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में आत्मा का वर्णन

कठोपनिषद — यमराज-नचिकेता संवाद

न जायते म्रियते वा विपश्चित् नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।' (2/18)

— यह आत्मा न जन्मती है, न मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश से यह नष्ट नहीं होती। (यही श्लोक गीता 2/20 में भी है।)

पंचकोश सिद्धांत (तैत्तिरीय उपनिषद 2/1-5)

आत्मा पाँच कोशों से ढकी है:

  1. 1अन्नमय कोश — स्थूल शरीर
  2. 2प्राणमय कोश — प्राण-शक्ति
  3. 3मनोमय कोश — मन और इंद्रियाँ
  4. 4विज्ञानमय कोश — बुद्धि
  5. 5आनंदमय कोश — सुषुप्ति में आनंद

इन सभी से परे — शुद्ध आत्मा (ब्रह्म) है।

बृहदारण्यक उपनिषद (4/4/5) — आत्मा और कर्म: 'तद्यथाकारी तद्यथाचारी तद्भवति।' — जैसा कर्म, जैसा आचरण — वैसा ही बनता है।

माण्डूक्योपनिषद — चार अवस्थाएं: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — इन तीनों का साक्षी 'तुरीय' ही आत्मा का शुद्ध स्वरूप है।

अद्वैत का निष्कर्ष: आत्मा और ब्रह्म एक हैं — 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव ही मोक्ष है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

उपनिषद में आत्मा का वर्णन कैसे है को संदर्भ सहित समझें

उपनिषद में आत्मा का वर्णन कैसे है का सबसे सीधा सार यह है: कठोपनिषद (2/18) में यमराज ने नचिकेता को बताया — आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत है; शरीर के नाश से यह नष्ट नहीं होती। तैत्तिरीय उपनिषद के पंचकोश सिद्धांत...

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