विस्तृत उत्तर
प्रेत योनि की पीड़ा धुंधुकारी के रूप में वर्णित है। वह बवंडर के समान रूप धारण कर दसों दिशाओं में भटकता था। शीत और धूप से पीड़ित रहता था। उसे भोजन और जल नहीं मिलता था, इसलिए भूख-प्यास से व्याकुल होकर ‘हा दैव’ कहता था। उसे कहीं आश्रय नहीं मिला। जब गोकर्ण ने जल छिड़ककर उसे बोलने योग्य बनाया, तब उसने बताया कि वह गोकर्ण का भाई धुंधुकारी है। उसने अपने दोष से ब्राह्मणत्व नष्ट किया, बहुत हिंसा की और स्त्रियों ने उसे कष्ट देकर मारा। वह कहता है कि अब प्रेत योनि में पड़ा हुआ दैवाधीन कर्मफल के कारण वायु-आहार से जीवित है।
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