विस्तृत उत्तर
हंस गीता में आत्मा को शरीर, मन, इंद्रिय और विषयों से भिन्न साक्षी बताया गया है। आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, और न जाग्रत, स्वप्न या सुषुप्ति से बंधती है। ये अवस्थाएँ मन और माया के स्तर पर घटती हैं, जबकि आत्मा उनका देखने वाला है। भगवान हंस बताते हैं कि जब जीव स्वयं को शरीर मानता है, तभी मन-विषय का बंधन वास्तविक लगता है। आत्मज्ञान में जीव समझता है कि वह शुद्ध चेतना है। यही समझ अहंकार की गांठ काटती है और साधक को तुरीय अवस्था की ओर ले जाती है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक

