विस्तृत उत्तर
यजुर्वेद के अंतर्गत वर्णित 'श्रीरुद्रम' (नमक-चमक) अथवा 'रुद्राष्टाध्यायी' के मंत्रों के अमोघ घोष के साथ देवाधिदेव महादेव के साकार प्रतीक 'शिवलिंग' पर विविध पवित्र द्रव्यों की अविरल धारा अर्पित करने की प्रक्रिया ही रुद्राभिषेक कहलाती है।
सनातन धर्म के शैव वांग्मय एवं वैदिक कर्मकांड में 'रुद्राभिषेक' को सर्वाधिक मंगलकारी, पापनाशक एवं अभीष्टफलदायी अनुष्ठानों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
ईश्वर गीता में श्रीरुद्रम की महत्ता को उद्घोषित करते हुए कहा गया है— 'वेदानाम् सामवेदीयम्, याजुषम् शतरुद्रीयम्' अर्थात् वेदों में सामवेद और यजुर्वेद में शतरुद्रीय (श्रीरुद्रम) सर्वश्रेष्ठ है।
रुद्राभिषेक मात्र एक भौतिक कर्मकांड नहीं है, अपितु यह पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा को जाग्रत कर आत्म-तत्त्व के साथ एकाकार करने की एक वैज्ञानिक-आध्यात्मिक प्रक्रिया है।





