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शास्त्र ज्ञान📜 तैत्तिरीय उपनिषद 2/1-6, छान्दोग्य 6/2/1-4, माण्डूक्योपनिषद 1/2, ऐतरेय उपनिषद 1/1-42 मिनट पठन

उपनिषद में ब्रह्मांड का वर्णन कैसे है?

संक्षिप्त उत्तर

उपनिषदों में ब्रह्मांड ब्रह्म से उत्पन्न है। छान्दोग्य (6/2/1) — आरंभ में एकमात्र 'सत्' था, उससे तेज-जल-पृथ्वी की सृष्टि हुई। तैत्तिरीय (2/1-6) में ब्रह्म → आकाश → वायु → अग्नि → जल → पृथ्वी का सृष्टि-क्रम है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' — यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में ब्रह्मांड का वर्णन

उपनिषदों में ब्रह्मांड — ब्रह्म की अभिव्यक्ति

उपनिषदों में ब्रह्मांड ब्रह्म से भिन्न नहीं — वह ब्रह्म का ही विस्तार है। सृष्टि का प्रत्येक कण ब्रह्म का अंश है।

छान्दोग्य उपनिषद (6/2/1-4) — सत् से सृष्टि

*'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।'*

— हे सोम्य! आरंभ में केवल 'सत्' था — एक, अद्वितीय। उस सत् ने इच्छा की — 'मैं बहुत हो जाऊं', तब उसने तेज, जल और अन्न (पृथ्वी) की सृष्टि की। तीन तत्त्वों के परस्पर मिश्रण से यह सम्पूर्ण विविध जगत बना।

तैत्तिरीय उपनिषद (2/1-6) — पंचकोश और पंचभूत

ब्रह्म से क्रमशः:

ब्रह्म → आकाश → वायु → अग्नि → जल → पृथ्वी → अन्न → प्राणी

*'आकाशाद्वायुः वायोरग्निः अग्नेरापः अद्भ्यः पृथिवी।'*

— यह सृष्टि का क्रम है। और मृत्यु के बाद पुनः यही क्रम विपरीत होकर ब्रह्म में लय होता है।

ऐतरेय उपनिषद (1/1-4) — सृष्टि की विस्तृत प्रक्रिया

आत्मा एक था। उसने 'लोक बनाऊं' — यह इच्छा की। उसने जल, मरीचि, मृत्यु और अप् — चार लोक बनाए। फिर लोक-पालकों की सृष्टि की — इन सबसे यह जगत बना।

माण्डूक्योपनिषद — माया और जगत

जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति — तीनों अवस्थाओं में दिखने वाला जगत ब्रह्म की माया है। तुरीय अवस्था में जगत का भान नहीं रहता — तब केवल ब्रह्म रहता है।

उपनिषद का ब्रह्मांड-दर्शन

*'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'* (छान्दोग्य 3/14/1) — यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। ब्रह्मांड और ब्रह्म अलग नहीं — अलगता केवल अज्ञान से है।

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शास्त्रीय स्रोत
तैत्तिरीय उपनिषद 2/1-6, छान्दोग्य 6/2/1-4, माण्डूक्योपनिषद 1/2, ऐतरेय उपनिषद 1/1-4
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