विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में ब्रह्मांड का वर्णन
उपनिषदों में ब्रह्मांड — ब्रह्म की अभिव्यक्ति
उपनिषदों में ब्रह्मांड ब्रह्म से भिन्न नहीं — वह ब्रह्म का ही विस्तार है। सृष्टि का प्रत्येक कण ब्रह्म का अंश है।
छान्दोग्य उपनिषद (6/2/1-4) — सत् से सृष्टि
*'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।'*
— हे सोम्य! आरंभ में केवल 'सत्' था — एक, अद्वितीय। उस सत् ने इच्छा की — 'मैं बहुत हो जाऊं', तब उसने तेज, जल और अन्न (पृथ्वी) की सृष्टि की। तीन तत्त्वों के परस्पर मिश्रण से यह सम्पूर्ण विविध जगत बना।
तैत्तिरीय उपनिषद (2/1-6) — पंचकोश और पंचभूत
ब्रह्म से क्रमशः:
ब्रह्म → आकाश → वायु → अग्नि → जल → पृथ्वी → अन्न → प्राणी
*'आकाशाद्वायुः वायोरग्निः अग्नेरापः अद्भ्यः पृथिवी।'*
— यह सृष्टि का क्रम है। और मृत्यु के बाद पुनः यही क्रम विपरीत होकर ब्रह्म में लय होता है।
ऐतरेय उपनिषद (1/1-4) — सृष्टि की विस्तृत प्रक्रिया
आत्मा एक था। उसने 'लोक बनाऊं' — यह इच्छा की। उसने जल, मरीचि, मृत्यु और अप् — चार लोक बनाए। फिर लोक-पालकों की सृष्टि की — इन सबसे यह जगत बना।
माण्डूक्योपनिषद — माया और जगत
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति — तीनों अवस्थाओं में दिखने वाला जगत ब्रह्म की माया है। तुरीय अवस्था में जगत का भान नहीं रहता — तब केवल ब्रह्म रहता है।
उपनिषद का ब्रह्मांड-दर्शन
*'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'* (छान्दोग्य 3/14/1) — यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। ब्रह्मांड और ब्रह्म अलग नहीं — अलगता केवल अज्ञान से है।





