विस्तृत उत्तर
वेद, उपनिषद और पुराणों में शिव और पार्वती के संबंध को मात्र एक पति-पत्नी के सामाजिक संबंध के रूप में नहीं, अपितु 'अद्वैत सिद्धांत' और सांख्य दर्शन के सर्वोच्च निरूपण के रूप में देखा गया है।
तात्विक रूप में, शिव 'पुरुष' (Pure Consciousness) हैं और पार्वती 'प्रकृति' (Creative Force)। पुरुष 'अकर्ता' (non-doer) और 'निर्गुण' है, जो केवल एक साक्षी भाव में रहता है, जबकि प्रकृति चलायमान है, जो ब्रह्मांड को आकार और गति प्रदान करती है।
जिस प्रकार जल और उसका स्वाद (रस) एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते, उसी प्रकार शिव और शक्ति अभिन्न हैं। शिव के बिना शक्ति निराधार है, और शक्ति के बिना शिव 'शव' (निष्क्रिय) के समान हैं।
गौरी-शंकर का पूजन केवल पति-पत्नी के बाह्य योग का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह साधक के आंतरिक शिव (चेतना) और शक्ति (कुंडलिनी ऊर्जा) के मिलन को दर्शाता है।





