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शिव-पार्वती तत्त्व: दार्शनिक रहस्य⏱ 2 मिनट पठन

श्वेताश्वतर उपनिषद में माया-तत्त्व का क्या वर्णन है?

श्वेताश्वतर उपनिषद: 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' — माया = प्रकृति (पार्वती), माया के स्वामी = महेश्वर (शिव)।

संक्षिप्त उत्तर

श्वेताश्वतर उपनिषद: 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' — माया = प्रकृति (पार्वती), माया के स्वामी = महेश्वर (शिव)। पार्वती प्रत्येक जीव में कुंडलिनी शक्ति रूप में सुप्त हैं। सहस्रार में शिव से मिलने पर मोक्ष।

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विस्तृत उत्तर

श्वेताश्वतर उपनिषद' शैव और शाक्त दर्शन का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। इसमें सांख्य दर्शन (प्रकृति और पुरुष) और वेदांत का अद्भुत समन्वय है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है:
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।' (माया को प्रकृति जानो और उस माया के स्वामी को महेश्वर जानो)

यहाँ माता पार्वती उसी 'माया' या 'प्रकृति' का साक्षात स्वरूप हैं, जिसके माध्यम से महेश्वर (शिव) इस संपूर्ण चराचर जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं।

आदि शंकराचार्य और रामानुजाचार्य दोनों ने इस उपनिषद पर भाष्य लिखे हैं और इसे मोक्ष का मार्ग बताया है।

श्वेताश्वतर उपनिषद के अनुसार माता पार्वती वह मूल 'प्रकृति' और 'माया' हैं जो प्रत्येक जीव के हृदय में कुंडलिनी शक्ति के रूप में सुप्त अवस्था में विद्यमान हैं। योग, भक्ति और तपस्या के माध्यम से जब यह शक्ति जागृत होकर सहस्रार चक्र में विशुद्ध चेतना (शिव) से मिलती है, तभी जीव को परमानंद और अंतिम मोक्ष की प्राप्ति होती है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

श्वेताश्वतर उपनिषद में माया-तत्त्व का क्या वर्णन है को संदर्भ सहित समझें

श्वेताश्वतर उपनिषद में माया-तत्त्व का क्या वर्णन है का सबसे सीधा सार यह है: श्वेताश्वतर उपनिषद: 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' — माया = प्रकृति (पार्वती), माया के स्वामी = महेश्वर (शिव)। पार्वती प्रत्येक जीव में कुंडलिनी शक्ति रूप में सुप्त...

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शिव-पार्वती तत्त्व: दार्शनिक रहस्य प्रश्नोत्तर
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