विस्तृत उत्तर
वेदांत दर्शन में माता पार्वती का सबसे प्रखर और प्रामाणिक प्रमाण 'केन उपनिषद' (तीसरे और चौथे खंड) में प्राप्त होता है। कथा के अनुसार, जब परब्रह्म की कृपा से देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की, तो वे अहंकार से भर गए कि यह विजय उनके अपने व्यक्तिगत बल से हुई है। तब उनके अहंकार को तोड़ने के लिए परब्रह्म एक रहस्यमयी 'यक्ष' के रूप में प्रकट हुए।
अग्नि देव यक्ष के सामने गए। यक्ष ने उनके सामने एक तिनका रखा और उसे जलाने को कहा, परंतु अग्नि अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को जला न सके। इसी प्रकार वायु देव भी उस तिनके को उड़ा न सके। अंत में जब देवराज इंद्र यक्ष के पास गए, तो यक्ष उनके सामने से अंतर्धान हो गए, जिससे इंद्र के अहंकार का पूर्णतः शमन हो गया।
उसी क्षण आकाश में अत्यंत तेजोमयी, स्वर्णिम आभा वाली देवी 'उमा हैमवती' (पार्वती) प्रकट हुईं। उमा ने इंद्र को ब्रह्मज्ञान देते हुए स्पष्ट किया कि वह यक्ष ही परब्रह्म थे, और देवताओं की सारी शक्ति — अग्नि की जलाने की क्षमता, वायु की बहने की क्षमता — उसी ब्रह्म की दी हुई शक्ति है।
आचार्य शंकर के भाष्य के अनुसार, यहाँ इंद्र 'बुद्धि' का, अग्नि 'प्राण/इंद्रियों' का और वायु 'मन' का प्रतीक है। माता पार्वती 'ब्रह्म-विद्या' (Supreme Knowledge) के रूप में स्थापित हैं, जो अज्ञान (अहंकार) को दूर कर सत्य का दर्शन कराती हैं।




