विस्तृत उत्तर
कथा के अनुसार, महर्षि दुर्वासा ने इंद्र को अत्यंत दुर्लभ और दिव्य पुष्पमाला भेंट की। देवराज इंद्र अपने राजसी ऐश्वर्य के मद में इतने चूर थे कि उन्होंने उस माला का उचित सम्मान नहीं किया और उसे अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उस माला को अपनी सूँड़ से पृथ्वी पर फेंक दिया और कुचल दिया। इस कृत्य से कुपित होकर दुर्वासा ऋषि ने शाप दिया कि इंद्र और तीनों लोक 'श्रीहीन' (लक्ष्मी विहीन) हो जाएँ।
इस घटना का दार्शनिक अर्थ अत्यंत स्पष्ट है। लौकिक ऐश्वर्य और धन तभी तक टिकता है, जब तक वह सद्गुण, विनम्रता और ज्ञान के प्रति सम्मान पर आश्रित रहता है। जब शक्ति, पद और संपदा का अहंकार बढ़ता है और ज्ञानियों/संतों का अपमान होता है, तो 'श्री' (समृद्धि और संतुलन) तत्काल उस स्थान का त्याग कर देती है।
शाप के परिणामस्वरूप स्वर्ग से कांति लुप्त हो गई, वनस्पतियाँ सूख गईं, यज्ञ बंद हो गए और असुरों ने देवताओं पर अधिकार कर लिया।
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