विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध में विस्तार से वर्णित है। जब महर्षि दुर्वासा के शाप से देवता श्रीहीन और शक्तिहीन हो गए, तब वे भगवान विष्णु की शरण में गए। विष्णु के निर्देश पर देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया।
इस विशाल कार्य में मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को नेती (रस्सी) बनाया गया। पर्वत को आधार न मिलने के कारण जब वह डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने 'कूर्म' (कछुए) का अवतार लेकर उसे अपनी विशाल पीठ पर धारण किया। इस मंथन से सर्वप्रथम हलाहल (विष) निकला, जिसे भगवान शिव ने पीकर नीलकंठ नाम प्राप्त किया। तदुपरांत कामधेनु, कौस्तुभ मणि, माता लक्ष्मी और अंत में अमृत कलश के साथ भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए।




