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विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन के अंतिम चरण में भगवान धन्वंतरि क्षीरसागर से प्रकट हुए। वे भगवान विष्णु के अंश और आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं। उनका रूप दिव्य, श्यामवर्ण और तेजस्वी था। उनके हाथों में अमृत से भरा स्वर्ण कलश था। धन्वंतरि का प्राकट्य केवल अमृत मिलने की घटना नहीं, बल्कि चिकित्सा, आरोग्य और आयुर्वेद की दिव्य उत्पत्ति का संकेत भी है। जैसे ही वे अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, असुरों ने लोभवश कलश छीन लिया। इसके बाद भगवान विष्णु को मोहिनी अवतार धारण करना पड़ा।
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