विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन वस्तुतः मनुष्य के अंतःकरण (मन) का मंथन है। देवता (सकारात्मक विचार, सद्गुण) और असुर (नकारात्मक विचार, दुर्गुण) दोनों मनुष्य के मन में ही वास करते हैं।
मंथन के लिए क्षीरसागर में जड़ी-बूटियाँ डाली गईं, जो श्रवण, सत्संग और अंतःकरण शुद्धि का प्रतीक हैं। वासुकि नाग मनुष्य की 'इच्छाओं या वासनाओं' का प्रतीक है, और मंदराचल पर्वत 'मन' का प्रतीक है।
भगवान का कूर्म अवतार यह दर्शाता है कि जब तक ध्यान या आत्म-मंथन को ईश्वर (विष्णु) का स्थिर आधार नहीं मिलता, तब तक मन रूपी पर्वत अज्ञान के सागर में डूब जाएगा।
मंथन में सर्वप्रथम 'हलाहल' (विष) का निकलना यह दर्शाता है कि ध्यान और साधना के प्रारंभिक चरण में हमारे दबे हुए क्लेश, विकार और पाप उभर कर सामने आते हैं। इन विकारों को शिव (वैराग्य) के द्वारा शांत किया जाना चाहिए। और अंत में निकलने वाला 'अमृत' वह मोक्ष और ईश्वर-प्राप्ति का परमानंद है।





