विस्तृत उत्तर
आध्यात्मिक दृष्टि से यह कथा प्रत्येक जीव की आत्मकथा है। गजेन्द्र उस 'जीव' (मनुष्य) का प्रतीक है जो शारीरिक बल, अहंकार और सांसारिक सुखों में मग्न है। सरोवर 'संसार' (सांसारिक मोह-माया) है, जो ऊपर से आकर्षक लगता है। ग्राह (मगरमच्छ) वह 'काल' या 'मृत्यु' है, जो अज्ञान रूपी जल में अत्यंत बलवान हो जाता है।
गजेन्द्र का परिवार इस बात का प्रतीक है कि मृत्यु के समय सगे-संबंधी और सांसारिक उपलब्धियाँ सब साथ छोड़ देती हैं। जब जीव अपनी 'मैं' और 'मेरा' का अहंकार त्याग कर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण (Absolute Surrender) करता है, तभी भगवान नारायण प्रकट होकर माया रूपी मगरमच्छ से उसकी रक्षा करते हैं।
यह कथा इस बात का भी प्रमाण है कि गजेन्द्र ने अपनी स्तुति में किसी विशिष्ट देव (विष्णु, शिव या ब्रह्मा) का नाम नहीं लिया, उसने केवल उस 'मूल कारण' को पुकारा, और क्योंकि विष्णु ही अंतर्यामी परब्रह्म हैं, वे जीव की पुकार सुनकर दौड़े चले आए।





