विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में भागवत कथा को अमृत से श्रेष्ठ बताने के लिये देवताओं और श्रीशुकदेवजी का प्रसंग आता है। जब श्रीशुकदेवजी राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाने के लिये सभा में बैठे, तब देवता अमृत का कलश लेकर आए। उन्होंने श्रीशुकदेवजी को प्रणाम करके कहा कि वे अमृत ले लें और बदले में देवताओं को भागवत-कथामृत दे दें। उनका विचार था कि परीक्षित अमृत पी लें और देवता भागवत-कथा सुन लें। श्रीशुकदेवजी ने इस विनिमय को स्वीकार नहीं किया। अमृत और कथा की तुलना कांच और महामणि जैसी बताई गई है। देवताओं को उस समय भक्ति-शून्य जानकर कथामृत नहीं दिया गया। इस प्रसंग से भागवत कथा की श्रेष्ठता बताई गई है: अमृत शरीर को लाभ दे सकता है, पर भागवत-कथा भक्ति, मन-शुद्धि, वैकुंठफल और मुक्ति से जुड़ी है। इसलिए इसे देवताओं के लिये भी दुर्लभ कहा गया है।
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