विस्तृत उत्तर
पद्म पुराण, लिंग पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार, मंथन से अमृत और शुभ रत्नों से पूर्व हलाहल विष और 'ज्येष्ठा' या 'अलक्ष्मी' की उत्पत्ति हुई।
अलक्ष्मी, जो दरिद्रता, कलह और दुर्भाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं, काषाय (मलिन) वस्त्र धारण किए हुए, लाल नेत्रों वाली, अत्यंत बूढ़ी, दंतहीन और भयंकर स्वरूप वाली थीं। उनके प्राकट्य से सभी देवता और असुर भयभीत हो गए।
अलक्ष्मी के इस प्राकट्य के पीछे एक अत्यंत गहरा मनोविज्ञान छिपा है। जब कोई व्यक्ति, समाज या राष्ट्र अपने मन रूपी सागर या अर्थव्यवस्था का मंथन (परिश्रम या सुधार) आरंभ करता है, तो सबसे पहले भीतर दबे हुए विकार, विष, भ्रष्टाचार और नकारात्मक प्रवृत्तियाँ (अलक्ष्मी) ही बाहर आती हैं।





