विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध में वर्णन है कि माता लक्ष्मी के प्राकट्य पर गंधर्वों ने मंगल गान किया, अप्सराओं ने नृत्य किया, पवित्र नदियों ने मूर्तिमान होकर उन्हें जल अर्पित किया और दिग्गजों ने सुवर्ण कलशों से उनका अभिषेक किया।
माता लक्ष्मी ने अपने हाथों में वैजयंती माला लेकर असुरों, देवताओं और ऋषियों की ओर अवलोकन किया। उन्होंने देखा कि किसी में तप है तो क्रोध भी है (दुर्वासा), किसी में शक्ति है तो काम भी है, किसी में ज्ञान है तो संग भी है। उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई भी सर्वगुण संपन्न, निर्विकार और नित्य नहीं लगा।
अंततः, उनकी दृष्टि परम शांत, योगनिद्रा में स्थित, निस्वार्थ और धर्म की प्रतिमूर्ति भगवान श्री हरि (विष्णु) पर पड़ी। उन्होंने भगवान विष्णु को अपने शाश्वत स्वामी के रूप में स्वीकार करते हुए उनके गले में वरमाला डाल दी और उनके वक्षस्थल (श्रीवत्स) पर सदैव के लिए विराजमान हो गईं।
यह घटना दार्शनिक रूप से सिद्ध करती है कि 'श्री' (स्थायी संपत्ति और ऐश्वर्य) उसी के पास स्थायी रूप से ठहरती है जो विष्णु तत्त्व के समान परम शांत, धर्मपरायण, अहंकार रहित और निस्वार्थ होता है।





