रामचरितमानस — बालकाण्ड
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'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — इसका क्या अर्थ है?
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संक्षिप्त उत्तर
अर्थ — निर्गुण (निराकार) और सगुण (साकार) दोनों ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। दोनों अकथनीय, अगाध, अनादि और अनुपम हैं। तुलसीदासजी ने दोनों को एक ही ब्रह्म के दो पहलू बताकर निर्गुण-सगुण विवाद का समाधान किया।
इस चौपाई का अर्थ है — निर्गुण और सगुण दोनों ब्रह्मके स्वरूप हैं। पूरी चौपाई — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा।
अकथ अगाध अनादि अनूपा॥' अर्थ — निर्गुण (निराकार, गुणरहित) और सगुण (साकार, गुणसहित) — ये दोनों ब्रह्मके ही स्वरूप हैं।
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