विस्तृत उत्तर
इस चौपाई का अर्थ है — निर्गुण और सगुण दोनों ब्रह्मके स्वरूप हैं।
पूरी चौपाई — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥'
अर्थ — निर्गुण (निराकार, गुणरहित) और सगुण (साकार, गुणसहित) — ये दोनों ब्रह्मके ही स्वरूप हैं। दोनों अकथनीय (जिन्हें वाणी पूरा वर्णन नहीं कर सकती), अगाध (अथाह), अनादि (जिनका आदि नहीं) और अनुपम (जिनकी कोई उपमा नहीं) हैं।
इस चौपाई में तुलसीदासजी ने निर्गुण-सगुण विवाद का समाधान किया है। उन्होंने न तो निर्गुण को छोटा कहा, न सगुण को — बल्कि दोनों को एक ही ब्रह्म के दो पहलू बताया। यह रामचरितमानस का अत्यन्त महत्वपूर्ण दार्शनिक सिद्धान्त है जो अद्वैत और विशिष्टाद्वैत दोनों को समाहित करता है।





