ईशोपनिषद (1): 'ईशावास्यमिदं सर्वं' — सब में ईश्वर। गीता (9.4): 'मया ततमिदं सर्वं जगत्' — मैं सम्पूर्ण जगत में व्याप्त। अर्थ: हर अणु-कण-प्राणी में वही एक ब्रह्म/चेतना विद्यमान है। यही अद्वैत, अहिंसा और
'भगवान कण-कण में हैं' — यह उपनिषदों और गीता के सबसे मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। शास्त्रीय प्रमाण: 1।
ईशोपनिषद (श्लोक 1): *'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्'* — इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी है, उसमें ईश्वर व्याप्त है।