भोग लगाने का प्रमुख मंत्र है — 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥' और 'शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च, आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥'
भगवान को अर्पित किए जाने वाले भोजन को शास्त्रों में 'नैवेद्य' कहा जाता है — 'भोग' वह कहलाता है जो प्रसाद के रूप में भक्तों को वितरित होता है।
नैवेद्य अर्पण के लिए निम्नलिखित मंत्र प्रयुक्त होते हैं: सर्वदेवों के लिए सामान्य नैवेद्य मंत्र: 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।