भगवान मनुष्यों की तरह नाराज नहीं होते। किंतु जब हम उनसे दूर जाते हैं तो — पूजा में मन न लगना, भीतरी बेचैनी, सत्संग से विरक्ति महसूस होती है। यह 'नाराजगी' नहीं, हमारे कर्म और मन का प्रतिबिंब है। पश्चात
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, किंतु पहले एक बात स्पष्ट करना जरूरी है — भगवान मनुष्यों की तरह 'नाराज' नहीं होते।
उनमें वैसा क्रोध नहीं जैसा हममें होता है। किंतु जब हम उनसे दूर जाते हैं — तो उस दूरी के परिणाम अवश्य अनुभव होते हैं।