भगवान से प्रेम जागृत करने के लिए — कथा-श्रवण, सत्संग, नाम-जप, उन्हें अपना परम सखा या माता मानना, और उनके गुण-लीला का मनन करें। यह प्रेम धीरे-धीरे साधना से विकसित होता है।
भगवान से प्रेम — यही भक्तिमार्ग का सार है। यह प्रेम लौकिक प्रेम से भिन्न है क्योंकि इसमें कोई स्वार्थ नहीं होता।
नारद भक्ति सूत्र में कहा गया है — 'सा त्वस्मिन् परम प्रेमरूपा' — भक्ति परम प्रेमस्वरूपा है।