विस्तृत उत्तर
भगवान से प्रेम — यही भक्तिमार्ग का सार है। यह प्रेम लौकिक प्रेम से भिन्न है क्योंकि इसमें कोई स्वार्थ नहीं होता। नारद भक्ति सूत्र में कहा गया है — 'सा त्वस्मिन् परम प्रेमरूपा' — भक्ति परम प्रेमस्वरूपा है।
भगवान से प्रेम जागृत करने के व्यावहारिक उपाय इस प्रकार हैं —
पहला — भगवान की कथा, लीला और गुणों का नित्य श्रवण करें। जो जितना अधिक सुनता है, उसका प्रेम उतना बढ़ता है। रामकथा, भागवत, भगवत्-लीला सुनने से हृदय में स्वाभाविक प्रेम जागता है।
दूसरा — संतों और भक्तों की संगति करें। जो भगवान से प्रेम करते हैं, उनके साथ रहने से हमारे भीतर भी वही भाव जागता है — 'संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात।'
तीसरा — भगवान को अपना परम सखा, माता, पिता या प्रिय मानें। जो जिस भाव से भगवान को भजता है, भगवान उसे उसी भाव से मिलते हैं।
चौथा — प्रतिदिन भगवान का नाम जपें, उनके लिए फूल-तुलसी अर्पित करें, आरती-भजन करें। इन क्रियाओं से धीरे-धीरे भाव बनता है।
पाँचवाँ — भगवान के चरित्र को जानें — जो उनकी करुणा, प्रेम और कृपा को समझता है, उसे उनसे प्रेम करना स्वाभाविक हो जाता है।
मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास — इन भक्तों का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यह प्रेम केवल कुलीन या विद्वान के लिए नहीं — हर जीव के लिए संभव है।





