भाग्य पूर्व कर्मों का परिणाम है और पुरुषार्थ वर्तमान का प्रयास। दोनों परस्पर पूरक हैं — भाग्य परिस्थितियाँ देता है, पुरुषार्थ उन्हें बदलता है। गीता में कर्म को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
भाग्य और पुरुषार्थ का संबंध परस्पर पूरक है, विरोधी नहीं। हिंदू दर्शन में इन दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह देखा जाता है।
भाग्य वह है जो पूर्व के कर्मों से मिला है — यह हमारे हाथ में नहीं। पुरुषार्थ वह है जो हम अभी कर सकते हैं — यह पूरी तरह हमारे हाथ में है।