भोजन ग्रहण करने से पूर्व अन्न के दोषों को नष्ट करने और उसे प्रसाद बनाने के लिए गीता के श्लोक 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ...' का उच्चारण करना चाहिए।
सनातन परंपरा में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि ब्रह्म का स्वरूप (अन्नं ब्रह्म) माना गया है।
भोजन पकाने वाले की भावना या अन्न के स्रोत से जुड़े सूक्ष्म दोषों को नष्ट करने के लिए भोजन ग्रहण करने से पूर्व मंत्र उच्चारण का कड़ा विधान है।