बिना आसन के नंगी जमीन पर बैठकर जप करने से पृथ्वी सारी आध्यात्मिक ऊर्जा सोख लेती है, जिससे जप निष्फल हो जाता है। ऊर्जा संरक्षण के लिए कुशा या ऊनी आसन अनिवार्य है।
सनातन धर्म के कर्मकांड में स्पष्ट उल्लेख है कि बिना शुद्ध आसन के किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या मंत्र जप पूरी तरह से निष्फल (व्यर्थ) हो जाता है।
वैज्ञानिक कारण — जब साधक मंत्र का उच्चारण करता है, तो उसके भीतर एक विशेष आध्यात्मिक और विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है।