चार आश्रम हैं — ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी जीवन), गृहस्थ (दांपत्य और कर्तव्य), वानप्रस्थ (सांसारिक जिम्मेदारियों से क्रमिक विरक्ति) और संन्यास (पूर्ण त्याग और मोक्ष-साधना)। मनुस्मृति में 100 वर्ष की आयु क
सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन को चार सुव्यवस्थित चरणों में बाँटा गया है जिन्हें 'चार आश्रम' कहते हैं।
इस व्यवस्था का उल्लेख जाबालोपनिषद में चारों आश्रमों के एकसाथ उल्लेख के रूप में सर्वप्रथम मिलता है और मनुस्मृति में इसे विस्तार से स्थापित किया गया है।