छिन्नमस्ता का मुख्य मंत्र है — 'श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा॥'। इसमें चार बीजाक्षर (श्रीं, ह्रीं, क्लीं, ऐं) संयुक्त हैं। वे दस महाविद्याओं में छठी, स्वयंबलि और आत्मसंयम की द
छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में छठी हैं।
उनका स्वरूप अत्यंत प्रतीकात्मक है — वे स्वयं अपना सिर काटकर उसे एक हाथ में धारण किए हुए हैं, और अपने ही रक्त की तीन धाराओं से अपनी दो शक्तियों (डाकिनी-वर्णिनी) को तथा स्वयं को भी पोषण दे रही हैं।