दान = श्रेष्ठ पात्र को, उचित समय पर, बिना स्वार्थ के देना। गरुड़ पुराण में 'वितरण' (वि+तरण) कहा गया है — देने से ही वैतरणी पार होती है। भूलोक, भुवर्लोक और देवलोक सभी दान से तृप्त होते हैं।
गरुड़ पुराण और सनातन शास्त्रों में 'दान' की परिभाषा अत्यंत गहरी और बहुआयामी है।
शाब्दिक अर्थ — 'दान' संस्कृत के 'दा' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'देना। ' जो दिया जाए वह दान है।