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दान क्या है?

दान = श्रेष्ठ पात्र को, उचित समय पर, बिना स्वार्थ के देना।

संक्षिप्त उत्तर

दान = श्रेष्ठ पात्र को, उचित समय पर, बिना स्वार्थ के देना। गरुड़ पुराण में 'वितरण' (वि+तरण) कहा गया है — देने से ही वैतरणी पार होती है। भूलोक, भुवर्लोक और देवलोक सभी दान से तृप्त होते हैं।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण और सनातन शास्त्रों में 'दान' की परिभाषा अत्यंत गहरी और बहुआयामी है।

शाब्दिक अर्थ — 'दान' संस्कृत के 'दा' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'देना।' जो दिया जाए वह दान है।

शास्त्रीय परिभाषा — वैतरणी नदी के संदर्भ में गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में कहा गया है — 'तत्त्वदर्शी मुनियों ने दान को ही वितरण (देना या बाँटना) कहा है।' यही कारण है कि दान द्वारा पार की जाने वाली नदी का नाम 'वैतरणी' है — 'वि+तरण' अर्थात् देने से पार होना।

दान का सार — सात्विक दान वह है जो बिना स्वार्थ के, सुपात्र को, उचित समय और स्थान पर, केवल कर्तव्य भावना से दिया जाए। गीता में कहा गया है — 'दातव्यमिति यद् दानं दीयते अनुपकारिणे' — जो बिना प्रत्युपकार की आशा के दिया जाए, वह सात्विक दान है।

गरुड़ पुराण में दान महिमा — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक के निवासी अर्थात् मनुष्य, भूत-प्रेत तथा देवगण — दान से संतुष्ट होते हैं।'

दान का संदेश — 'मृत्यु के बाद केवल कर्म साथ जाते हैं, दान उसी कर्म का सर्वश्रेष्ठ रूप है।'

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