न्यूनतम 10-15 मिनट की दैनिक पूजा पर्याप्त है। दीप, धूप, नैवेद्य, आरती और एक मंत्र जप — इतने में सार्थक पूजा होती है। शास्त्र कहते हैं — समय से अधिक भाव महत्वपूर्ण है।
शास्त्रों में देवता का त्रिकाल (तीन बार — सुबह, दोपहर, शाम) पूजन बताया गया है।
परंतु कलियुग के व्यस्त जीवन को ध्यान में रखते हुए संतों ने न्यूनतम एक बार — प्रातःकाल — की पूजा का विधान बताया है।