दक्षिणामूर्ति रूप में शिव ने वट-वृक्ष के नीचे सनकादि चारों ऋषियों को मौन के माध्यम से ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश दिया। यह रूप शिव के आदि-गुरु स्वरूप का प्रतीक है — परम ज्ञान वाणी से नहीं, मौन से मिलता है।
दक्षिणामूर्ति शिव का अत्यंत शांत, ज्ञानमयी और गुरु-स्वरूप है।
'दक्षिण' = दाहिना/दक्ष, 'मूर्ति' = स्वरूप — अर्थात दक्षिण दिशा की ओर मुखकर बैठे जगद्गुरु।