विस्तृत उत्तर
दक्षिणामूर्ति शिव का अत्यंत शांत, ज्ञानमयी और गुरु-स्वरूप है। 'दक्षिण' = दाहिना/दक्ष, 'मूर्ति' = स्वरूप — अर्थात दक्षिण दिशा की ओर मुखकर बैठे जगद्गुरु।
दक्षिणामूर्ति किसे ज्ञान देते हैं — पुराणों के अनुसार सनकादि ऋषि (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार) — ये चारों ब्रह्मा के पुत्र और परम ज्ञानी थे। वे ज्ञान-प्राप्ति के लिए भ्रमण करते हुए शिव के पास आए। शिव बालरूप में वट-वृक्ष के नीचे उत्तर दिशा में पैर पसारे, दक्षिण की ओर मुख करके बैठे थे। ऋषियों के प्रश्न सुनकर शिव ने मौन धारण किया और ज्ञान का उपदेश मौन द्वारा दिया — यही 'मौन व्याख्यान' है।
मौन का अर्थ — परम ज्ञान शब्दों से परे है। शिव का मौन यह दर्शाता है कि आत्म-तत्व को वाणी से नहीं, केवल अनुभव से जाना जा सकता है।
दक्षिणामूर्ति का महत्व — शिव पुराण में दक्षिणामूर्ति को वेद, शास्त्र और तंत्र के महान गुरु कहा गया है। वे वट-वृक्ष के नीचे बैठकर अपने मौन से जगत को ज्ञान देते हैं। आज भी भारत में दक्षिणामूर्ति की मूर्तियाँ शिव-मंदिरों में दक्षिण दिशा में स्थापित होती हैं।





