विस्तृत उत्तर
नटराज शिव का वह दिव्य स्वरूप है जिसमें वे सर्वोत्तम नर्तक हैं। 'नट' = कला, 'राज' = राजा — अर्थात समस्त कलाओं के स्वामी।
नटराज रूप का अर्थ — शिव का तांडव नृत्य केवल शारीरिक नृत्य नहीं है; यह ब्रह्माण्ड की पाँच महान क्रियाओं का प्रतीक है — सृष्टि (निर्माण), स्थिति (पालन), संहार (विनाश), तिरोभाव (अंतर्धान) और अनुग्रह (मोक्ष)। नटराज की संपूर्ण मूर्ति इन्हीं पाँच कृत्यों को समेटे हुए है।
व्यापक संदेश — शिव का नटराज स्वरूप यह स्थापित करता है कि ब्रह्माण्ड में स्थित समस्त जीवन, उनकी गति, कंपन और ब्रह्माण्ड से परे शून्य की निःशब्दता — सभी कुछ एक शिव में ही निहित है। नटराज की संपूर्ण आकृति 'ॐकार' स्वरूप जैसी दिखती है।
नटराज की कथा — शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार तारकारामय वन में अहंकारी ऋषियों ने अपस्मार नामक बौने राक्षस को प्रकट किया। शिव ने नट वेश धारण कर उस वन में प्रवेश किया, अपस्मार को पैरों से दबाया और नटराज रूप में तांडव किया। तभी से वे नटराज कहलाए। शिव के गण तंडु ने इस नृत्य को प्रचारित किया इसीलिए यह 'तांडव' कहलाया।





